श्री रणपत तथा श्री धाता को दीक्षित करना

श्री रणपत तथा श्री धाता को दीक्षित करना

shri baba ranpat dhata ji

एक बार  सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी भ्रमण  करते हुए, रम्मत ( धर्मयात्रा) के प्रसंग में, खरक नामक एक ग्राम में पहुंचे । वहीं उन्होंने ग्राम की पश्चिम दिशा में अपना पावन ‘ धूना है रमाया । खरक -वासियों में, सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी के प्रति, अपार श्रद्धा थी । गांव के सभी नर-नारी, आबाल-वृद्ध-वनिता, सिद्ध बाबा मस्तनाथ जो के शुभ-दशंन के लिये आने लगे और सारे गांव में उनके वहां पधारने के सम्बाद से अपार प्रसन्नता छा गईं ।

खरक गांव के प्रमुख प्रवासियों ने सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी से कहा कि… हे  भगवन  आपने हम पर बहुत – कृपा की है जो आप हमारे गांव में पधारे हैं अब आप कृपा कर हमारे योग्य जो भी सेवा हो वह बतलाने क्री कृपा करें । सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी ने उत्तर दिया कि इस ग्राम में क्षत्रिय-कुल में उत्पन्न दो चालक रहते हैं । वे दोनों ही मेरे परम- भक्त तथा शिष्य हैं । मैं यहाँ से  उन्हें अपने पास लिवा ले जाने के लिये आया हूं । लोगों ने इन दोनों बालकों के सम्बन्थ में विवरण पूछते हुए सिद्ध शिरामणि से कहा कि आप उन दोनों का नाम बताकर बडी प्रन्नता से उन्हें अपने साथ लेते जाइए । यह चर्चा चल ही रही थी कि इतने ही में उसी स्थान पर श्री रणपत तथा श्री धाता नामक दो क्षत्रिय कुमार भी आ पहुंचे । सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी ने उन दोनों क्षत्रिय-कुमारों को देखते ही कहा कि यही दोनों बालक मेरे आदिकाल के शिष्य हैं । श्री रणपत तथा श्री धाता नामक दोनों क्षत्रिय कुमारों ने सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी के पावन चरणों को वन्दना क्री और उनसे कर…बद्ध प्रार्थना की कि वे उन दोनों को अपना शिष्य बनाने क्री कृपा करे और उन्हें अपने साथ ” लेते जायें ।

सिद्ध शिरोमणि ने उत्तर दिया कि ‘ प्रत्येक कार्य को धैर्य तथा विवेक से करना . चाहिए । पहले तुम दोनों अपने माता-पिताके पास जाओ और उनसे मेरे साथ चलने के लिए आज्ञा मांगो । उनकी आज्ञा मिलने के बाद ही तुम्हें मेरे साथ चलना चाहिए ।

रणपत तथा श्री धाता के माता- पिता को जब इस सारे प्रसंग का चता चला तो वे बहुत घबराए और वे दोनों ही सिद्ध शिरोमणि बाबा  मस्तनाथ जी के पास पहुंचे । हमारा इन बालकों पर बहुत ही मोह है । यद्यपि आप इन्हें अपना आदि-कात का शिष्य बतला रहे हैं पर हमारा मन इन्हें आपको अर्पण करने का नहीं है । हमारी तो निरन्तर यही चेष्टा होगी कि हम इन दोनों को अपने ही पास रखें और आपको कतई न दें ।हमारी आपसे भी यही विनय है कि आप हम यह कृपा करें और इन दोनों बालकों को  अपनी कृपा के प्रसाद के रूप में, हमारे पासरहने दे|

यह कह कर श्री रणपत तथा श्री धाता के याता-पिता दोनों बालकों को अपने साथ गांव में लिवा ले गए, ।सिद्ध सिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी, इस घटना के कुछ दिन बाद तक खरक गाम में ही रहते रहे । इसके पश्चात पुन: अपने खोखरा — कोट के तपोबन में स्थित अस्थल बोहर योगाश्रम  (मठ) में वापिस चले गए ।

श्री ऱणपत तथा श्री धाता दोनों ही क्षत्रिय-कुमारों ने अपने भाता…पिता से बहुत आग्रह किया कि वे उन्हें सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी का शिष्य बन कर ” योग साधना ‘ करने क्री अनुमति देने को कृपा करे, पर माता-पिता ने उनका यह आग्रह इस आधार यर अस्वीकार कर दिया कि ” योग-मार्ग नितान्त कठिन मार्ग है, इस मार्ग की साधना खांडे की धार यर चलने के समान कठिन है । योग-मार्ग पर चलने चालों क्रो अहंकार तथा ममता का पूर्णतया परित्याग करना पड़ता है । साथ ही श्री रणपत तथा श्री धाता के माता-पिता ने उन्हें समझाते हुए यह भी कहा कि तुम दोनों क्षत्रिय कुमार हो, तुम दोनों के लिए जीवन-निर्वाह हेतु भिक्षा प्राप्त करने के लिए दूसरे लोगों के सामने हाथ पसारना नितान्त कठिन होगा । यहाँ पर तुम अपने घर पर  वहुत आराम से रहते हो । योग साधना करने चालों को तो निविड़ वन-खण्ड में रहना पड़ता है उन्हें तो धूप के परिताप से बचने के लिए पर्याप्त छाया तक का भी आश्रय नहीं मिल पता । वर्षा तथा शीत ऋतुओं के कष्टों से  बचने का भी योगियों के पास कोई समुचित साधन नहीं रहता । इन परिस्थितियों में तुम्हारे लिये यह उचित है कि तुम घर पर ही रहो  । श्री रणपत तथा श्री धाता दोनों ही पूर्ब…जन्म के परम तपस्वी थे । उन्हें अन्तर्धान प्राप्त था । उन्होंने माता-पिता को उत्तर दिया कि हम सामान्य स्थिति के योगी नहीं रहेंगे । आप यह देखेंगे कि हमें किसी के पास भिक्षा प्राप्त करने के लिए जाना नहीं पडेगा । हम जिस स्थान यर भी बैठेगें श्रद्धालु भक्तजन वहीं आकर हमेँ “भेंट-पूजा प्रदान करेंगे । हमारी यह स्थिति इसलिए होगी कि हम पर गुरूदेव प्रसन्न हैं । गुरु की महिमा अपार है । सत्गुरू की कृपा से सव कुछ सम्भव है । श्री रणपत तथा धाता दोनों ने वहुत चेष्टा की कि उन्हें माता- पिता श्री गुरूदेव के श्री चरणों में उपस्थित होकर दीक्षा ग्रहण करने क्री अनुमति प्राप्त हो जाए परन्तु भाता…पिता ने इसकी आज्ञा नहीं दी । श्री रणपत्त तथा श्रीधाता दोनों ही योग मार्ग अपनाने का दृढ़ निक्षय कर चुके थे । अत उन्होंने माता-पिता से आज्ञा प्राप्त करने के लिये एक विचित्र प्रकार का उपाय ढूंढ निकाला । वे दोनों ही यह जानते थे कि उनके माता-पिता नितांत सांसारिक व्यक्ति हैं । वे मोह-ममता के आधीन है । उन्हें लक्ष्मी  का लोभ है और वे घर में होने वाली  किसी भी हानि को बर्दाश्त नहीं कर सकेगे अत: उन्होंने माता-पिता क्री इस दुर्बलता का लाभ उठाकर अपना कार्य स्रम्पन्न करने का निश्चय किया ।

इस निश्चय के अनुसार ही उन्होंने आचरण प्रारम्भ किया । उन्हें जब भी अवसर मिलता वे घर  में रखा घी,दूध, दही, अन्न-वस्त्र गरीबों तथा दीन-दुखियों को दे डालते ।

श्री रणपत तथा श्री धाता क्रो माता- पिता ने वहुत समझाया कि इस प्रकार सम्पत्ति को लुटा डालना गृहस्थ-घर्म पालन करने की राह में बाथा उपस्थित करता है । परन्तु श्री रणपत तथा श्री धाता ने अपने मार्ग का त्याग नहीं किया । वे जब भी अवसर पाते घर क्री सम्पत्ति इसी भांति चुराते रहते । अन्त में इन दोनों की इस आदत में कोई परिवर्तन न आने से माता-पिता ने इन दोनों को आज्ञा है दी कि वे योग-मार्ग में प्रवृत हो सकते हैं और सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी से दीक्षा ग्रहण कर सकते हैं । माता- पिता क्री आज्ञा प्राप्त कर तथा उनसे ” आशीर्वाद ग्रहण कर श्री रणपत तथा श्री ‘ धाता दोनों ही क्षत्रिय-कुमार सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी के प्रख्यात योगाश्रम ‘ अस्थल ब्रोहर मठ में पहुंचे और वहीं जाकर  गुरूदेव की सेवा में संलग्न हो गये ।

shri baba ranpat dhata ji

 

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