सिद्ध श्री चौरगीनाथ ‘ जी ‘का समय(मठ अस्थल बोहर का इतिहास भाग-2)

सिद्ध श्री चौरगीनाथ ‘ जी ‘का समय

 

सिद्ध श्री चौरगीनाथ ‘ जी का सम्बन्ध एक राजघराने से था । वे राज़ शालिवाहन के सुपुत्र तथा राजा रिंसालू के वैमात्रेय भाई थे अत्त: इन दो प्रख्यात ऐतिहासिक व्यक्तियों के कारण इनंके समय की सही जानकारी प्राप्त का सकना कठिन नहीँ रहता ।

यद्यपि पौराणिक परम्परा के नाथ-सम्प्रदाय के मराठी भाषा के ग्रन्थ “योगिसम्प्रदायाविष्कत्ति” में इन्हें उन राजा शालिवान का सुपुत्र माना जाता है जिनके नाम पर आज़ थी शक-सम्बत चालू है पर यह मान्यत्ता ऐतिहासिक तथ्यों से पुष्ट नहीं होती ।

राजा रिसालू पूरण भगत अथवा सिध्द श्री चौरगीनाथ जी के वैमात्रेय भाई थे और प्रचलित लोक-कथाओ के अनुसार उनका जन्म ही सिद्ध श्री चौरगीनाथ जी के आर्शीवाद से हुआ था । राजा रिसालू सातवीं सदी के अंत में अथवा आठवीं सदी के आदि में राज्य करते रहे है यह तथ्य निर्विवाद है । राजा रिसालू के काल में मोहम्मद बिन कासिम ने भारत पर प्रथम मुस्लिम आक्रमण का नेतृत्व किया था । इस आक्रमण की समाप्ति के  पश्चात् मोहम्मद बिन  कासिम तथा राजा रिसालू में परस्पर सन्धि हुई थी यह तथ्य भारतीय त्तथा अरबी इतिहास ग्रन्यौ में उपलब्ध है । प्रख्यात इतिहास बेता डा0 टेम्पल ने सन् 1884 में इस सम्बन्ध  में शोध की थी उससे भी यही तथ्य प्रमाणित एवं पुष्ट हुए हैं ।

 

डाक्टर टेम्पल की मान्यता है कि पजाब’ तथा हरियाणा की दो जाट-उपजातियॉ (सिन्धु अथवा सिंधड) तथा संसी ‘ अथवा संसीवाल ‘ अपना सम्बन्थ राजा रिसालू से मानती है । इनमे” से सिद्धू अथवा सिंधड उपजाति के  व्यक्ति अपना सम्बन्थ जैसलमेर के  संस्थापक’ राजा जैसल से जोडते, हुए उन्हें अफ्ता सगोत्रीय तथा अपनी ही वश’-परम्परा में स्वीकार काते हैं । संसीवाल ‘ उपजाति के  व्यक्ति अपना सम्बन्थ राजा गज से स्थापित काते है ।

 

सिन्धड़ जाति के  अनेक गाव’ अब भी हरयाणा  में उपलब्ध है और इसी भांति संसिवाल . उपजाति के  भी अनेक गाब’ यहीँ पाये जाते हैं ।

राजस्थान के  प्रसिद्ध इतिहास लेखक कर्नल टाड ने अपने इतिहास में लिखा है कि राजा गज से गज़नी के  सुल्तान की लडाई हुईं थी उसमें राजा गज  हार गये थे और उन्हें पूर्व  दिशा की ओर बढने, क्रो विवश होना पडा. था । राजा गज ने ही तब सियालकोट नगर की स्थापना हमारे सिद्ध श्री चौरगीना’थ जी के  पिता राजा शालिवाहन की राजधानी रही है ।

 

वास्तव में गजनी के  सस्थापक्र’ भी राजा गज ही थे । उनके  समय में उसका नाम गजनबी था । कालान्तर में सुल्तान का उस पर अधिकार हो गया और राजा गज उसे सुल्तान से पुनः प्राप्त नहीं का सके  अत: गजनबी ही सुल्तान की गजनी के  नाम से प्रख्यात  हो गई ।

 

अरबी इतिहासकारों ने राजा रिसालू की बजाय राजा रिसल नाम ही अपने इतिहास ग्रन्धों में लिखा है । डाक्टर टेम्पल की मान्यता है कि राजा रिसल  ही राजा रिसालू थे । रिसालू शब्द को अरबी लिपि में लिखा जाने पर इसे रिसालू अथवा रिसल दोनों ही प्रकार से पढा जा सकता  है । यह तथ्य अरबी भाषा के  विद्वान स्वीकार करते हैं ।

इन सभी तथ्यों से यही सिद्ध होता है कि राजा रिसालू का व्यक्तित्व इतिहास सम्मत है तथा उनका काल सातवीं सदी के अन्त में अथवा आठवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही सिद्ध होता है अत: उनके पिता शालिवाहन को,शाके  सम्वत् के प्रवर्तक, राजा शालिवाहन के साथ मिलाना निश्चित रूप से भ्रामक तथा तथ्यों के विपरीत है ।

राजा रिसालू के नाम का विशुद्ध रूप ईंष्यालु रहा प्रतीत होता है । ईष्यालु का ही अपभ्रंश रिसालू है । यह तथ्य सभी जानते हैं कि राजा शालिवाहन की छोटी रानी बडी रानी के राजकुमार के प्रति ईष्यालु थी । आगे चल कर उसी बडे राजकुमार के पूरण भगत अथवा सिद्धि श्री चौरंगी नाथ बन जाने पर उन्ही की कृपा तथा शुभाशीर्बाद से इस ईंष्यालु रानी को पुत्र…रत्न को प्राप्ति हुई अत: लोगों ने लोक-वाणी से इस ईंष्यालु रानी को पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई अत : लोगों ने लोक-वाणी में उनका नाम भी माता के स्वभाव के अनुरूप ईंष्यालु ही रख दिया । धीरे धीरे इस नाम में परिवर्तन आया और ईंष्यालु ही राजा रिसालूके रूप में प्रख्यात हो गये ।

नाथ…सम्प्रदाय के अधिकारी विद्वान् आचार्य श्री हजारीप्रसाद जी द्विवेदी भी राजा रिसालू तथा उनके बडे भाई सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी का यही काल स्वीकार करते हैं । सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी के समय में ही उनके गुरू भाई सिद्ध श्री गोरक्षनाथ जी हुए हैं अत: जो कल सिद्ध श्री गोरक्षनाथ जी का ही वही सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी का भी होना चाहिए यह तथा सभी स्वीकार करेंगें ।

राजा रिसालू और सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी के काल का सही ज्ञान प्राप्त करने के निमित्त यदि हम इतिहास के द्वारा सिद्ध श्री गोरक्षनाथ जी का सही काल क्या था यह पता लगायें को इससे भी सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी के काल का निर्णय करने में सहायता मिलती है ।

 

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