प्रेम में कोई लेन देन नहीं होता

यात्रा पर जाते समय श्री बाबा मस्तनाथ जी अपनी शिष्य मण्डली को सदैव अपने साथ रखते थे। उनमें से एक अपनी पुस्तक में लिख देता था। प्रतिदिन का उसका यही क्रम था। ऐसे ही दिन बीतते जा रहे थे। यात्रा करते करते सूरज ढल चुका था। पक्षियों की चहचाहट सुनाई दे रही थी, सब पक्षी अपने-अपने घोंसलों में लौट आये थे। सर्दियों की शाम थी, घना अंधेरा हो गया था। बाबाजी से विचार किया। आज यहीं विश्राम करना ठीक रहेगा। श्री बाबाजी ने एक बरगद के पेड़ के नीचे अपना आसन लगा दिया।

एक ग्वालिन निकट ही अपत्री गाय का दूध बेच रही थी  | श्री बाबाजी ने अपने शिष्यो को कहा- उस ग्वालिन को देखो, जो दूध बेच रही है। शिष्य आश्चर्यचकित हो देखने लगे। उन्होंने मन में विचार किया कि इसके पीछे अवश्य ही कोई कारण होगा। जो भी उसके पास दूध लेने आता, वह उसको ; नापकर दूध दे देती थी और बदले में उनसे पैसे ले लेती थी। थोड़ी झगड़ालू प्रवृति की प्रतीत हो रही थी, उसी समय उसने देखा सामने से एक नवयुवक आ रहा है। उसे दूर से देखते ही ; वह प्रसन्न हो उठी। तब तक वह नवयुवक उसके निकट पहुँच गया। उसने उस ग्वालिन से दूध लेने का अनुरोध किया। : ग्वालिन ने बिना नाप तोल के उसे दूध दे दिया। वह युवक दूध लेकर वहाँ से चला गया। बदले में न कोई लेन न देन | वह उस युवक को जाते हुए देखती रही। उस समय वह बिल्कुल बेसुध सी दिख रही थी शिष्य बिना बोले न रहा गया वह कहने

लगा गुरुदेव ! यह तो बड़ी ही विचित्र बात है। बहुत देर से मैं इस ग्वालिन को देख रहा हूं। यह सबसे दूध के बदले पैसे ले रही थी और किसी-किसी से तो पैसे के लिए झगड़ा भी करने लगती थी। परन्तु जो युवक अभी दूध लेकर गया है, उसे तो दूर से ही देखकर यह प्रसन्न हो उठी। न ही उससे कोई पैसा लिया | गुरुदेव कहने लगे-मैंने तुम्हें यही सब तो देखने के लिए कहा था यही तो प्रेम है। जब किसी से प्रेम होता है तो उसमें कोई लेन-देन नहीं होता। इसलिए भगवान् का नाम लेने में भी हिसाब-किताब नहीं होता। कितने मंत्र हुए आज, कितने हुए थे कल, और कितने होंगे कल। यह सब लिखने से प्रेम नहीं होता। यह प्रेम की परिभाषा तो वही समझ सकता है जो उससे (भगवान्) प्रेम करता है। जो शिष्य मंत्र लिख रहा था वह बहुत शर्मिन्दा हुआ और गुरु के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा।

 

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