समर्पण का वास्तविक अर्थ

समर्पण का वास्तविक अर्थ है शुद्ध के प्रति मन में कोई सन्देह न रहे। गुरु के श्रीमुख से जो भी आदेश निकले उससे पूर्व शिष्य समझ जाये और उस कार्य को पूरा कर  दे | यदि हमने गुरु से तर्क वितर्क किया तो हम शिष्यता की भावभूमि से परे हट जाते हैं। जो सेवा नहीं कर सकता, वह समर्पण भी नहीं कर सकता।

जहाँ समर्पण नहीं है वहाँ शिष्यता भी नहीं है| शिष्य के समक्ष कोई गुरु  पर प्रहार करे, प्रश्न के माध्यम से या शब्दों के माध्यम से और वह चुपचाप सुन ले। या फिर गुरु की निन्दा को चुपचाप सुन ले तो उससे बड़ा पापी इस संसार में कोई नहीं है। उदाहरण- एक ही गुरु के पास शिक्षा प्राप्त करने वाले सारे शिष्य एक समान विद्या प्राप्त नहीं कर  पाते | सभी शिष्य गुरु की बातें सुनते तो अवश्य दिखाई देते हैं, किन्तु एक समान विद्या प्राप्त नहीं कर पाते, ऐसा क्यों होता है?

कुछ शिष्य समर्पण का दिखावा तो अवश्य करते हैं, किन्तु उसका वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाते। गुरु चरणों में फल-फूल चढ़ाने से या मिठाई चढ़ाने मात्र से समर्पण सिद्ध नहीं होता | वह तो श्रद्धा और  विश्वास ये होता हे |

गुरु के समक्ष दूसरों पर दोषारोपण न करें। उन पर दोषारोपण करके तुम बड़े नहीं स्वयं छोटे हो जाओगे।

 

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