गुरुदेव (सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी )का त्रिकाल बोध

#बाबा मस्तनाथ जी का त्रिकाल बोध#

सिद्ध शिरोमणि श्री बाबा मस्तनाथ जी एक बार अपने अनेक शिष्यों के साथ देश की धार्मिक यात्रा के लिए चले जा रहे थे | रास्ते में उन्हें एक बहुत बड़ा टीला दिखाई पड़ा उस टीले के चारों ओर उन दिनों बीहड़ वन था |वनखंड में उस विशालकाय टीले को देखकर सिद्ध शिरोमणि मस्त नाथ जी ठठाकर हंसने लगे गुरुदेव को हंसते देख सारे शिष्यों को बहुत आश्चर्य हुआ |

शिष्यों के आश्चर्य का कारण यह था कि वर्षों से सिद्ध शिरोमणि के पास रहते हुए भी उन्होंने अपने गुरुदेव को ना कभी हंसते देखा था और ना ही कभी दुखी होते देखा था शिष्य जन उन्हें सर्वदा सब परिस्थितियों में समभाव ही देखते आए थे सुख-दुख, हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, आदि किसी भी भौतिक द्वंद का उन पर कभी कोई भी प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं हुआ था |

ऐसे राग विराग शून्य  गुरुदेव “ठहाका लगाकर हंसे” यह अपने आप में एक अद्भुत घटना थी|

इससे शिष्य जनों का चकित होना स्वभाविक ही था गुरुदेव के हंसी के ठहाके से विस्मित शिष्यों ने अपने गुरुदेव से अट्टहास का कारण पूछा सिद्ध शिरोमणि ने शिष्यों से कहा कि आप सब सम्मुख उपस्थित जो यह विशाल टीला देख रहे हैं यह किसी समय अत्यंत सुंदर तथा सुरम्य नगर था इसमें ऊंची ऊंची अट्टालिकाएं, भव्य भवन थे तथा इसमें अनेक मंदिर तथा मठ थे इस की शोभा इंद्रपुरी अमरावती के तुल्य थी |

एक बार इस नगर में एक योगी आए उन्हें भोजन बनाने के लिए एक मिट्टी की हांडी की आवश्यकता प्रतीत हुई वह एक कुम्हारी के घर गए वहां जाकर उन्होंने कुम्हारी से कहा कि माता मुझे भोजन बनाने के लिए एक मिट्टी की हांडी देने की कृपा कीजिए वह कुम्हारी बड़ी ही कलमुही कृपण तथा कटु भाषण थी उसने ना केवल हंडिया देने से इनकार किया अपितु चूल्हे पर रखी उबलते पानी की हंडिया ही उस योगी के मुंह पर दे मारी नगर के किसी भी नागरिक ने कुम्हारी के इस कुकृत्य की आलोचना नहीं की और अपने स्वार्थ में रत वहां  नागरिक इस अन्याय को देख सर्वथा मौन रहे |

इसी अपराध के कारण योगी के शाप से ध्वस्त अमरावती तुल्य वह नगर आज विशाल मिट्टी के टीले के रूप में  विध्वस्त और बर्बाद होकर चौपट हुआ पड़ा है उनके अट्टहास (ठठाकर कर हंसने) का यही कारण है सब शिष्यों को यह कथा सुन कर बड़ा आश्चर्य हुआ टीले की  यह कथा सुनकर स्तंभ और भौचक्के रह गए|

शिष्यों ने अनुभव किया कि साक्षात महासिद्ध साक्षात महा सिद्ध गुरु गोरक्षनाथ जी ही बाबा मस्त नाथ जी के स्वरुप में उनके सम्मुख विराजमान हैं और वह ही उन्हें किसी युगांतर की कथा सुना रहे हैं |

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