गोरख वाणी मरो हे जोगी मरो

गोरख वाणी

मरो हे जोगी मरो

नादै लीन ब्रह्मा, नादै लीना नर हरि।१।
नादै लीना ऊमापति, जोग ल्यौ धरि धरि।२।
नाद ही तो आछै, सब कछू निधांनां।३।
नाद ही थै पाइये, परम निरवांनां।૪।

महायोगी गोरख कहते है की मूल ॐकार के अभिव्यक्त रुप नाद (शब्द ब्रह्म) मे ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश लीन (व्याप्त) है। योगी को चाहिए की नाद की अनुभूति को सदा सहेज कर रखे व उसका रक्षण करे, क्योंकी नाद की यह अनुभूति ही परम योग (एकात्मकता) की प्राप्ति करा देती है। महायोगी गोरख का कथन है की नाद मे ही सर्व निधियो (खजानो, उपलब्धियो) का वास है (यानी नाद सिद्धि योगी को समर्थ कर देती है ) और नाद से ही योगी निर्वाण पद को पा जाता है।

ॐकार आछै, मूल मंत्र धारा।१।
ॐकार व्यापीले, सकल संसारा।२।
ॐकार नाभी ह्रदै, देव गुरु सोई।३।
ॐकार साधे बिना, सिधि न होई।૪।

महायोगी गोरख कहते है की सभी के मूल मे ॐकार (शब्द रुप या नाद रुप परमात्मा) का वास है और उसी से सारी धारा छूटी है ( सारी सृष्टि का उत्पति कर्ता वही है)। सारे संसार मे वही व्याप रहा है, नाभी से हृदय तक ( स्वाधिष्ठान से, हृदय अनाहत अादि तक) उसी का निवास है। गोरखनाथ जी कहते है की ॐकार ही देवता है, ॐकार ही गुरु है और बिना ॐकार को साधे सिद्धि नही हो सकती है।

दसवैं द्वार निरंजन उनमन बासा, सबदैं उलटि समांनां।१।
भणंत गोरषनाथ मछींद्र नां पूता, अविचल थीर रहांनां।२।

महायोगी गोरख का कथन है की दशमद्वार (सहस्त्रार मार्ग) से निरंजन रुप होकर हमने उनमन मे वासा कर लिया और वापिस शब्द मे शब्दरुप हो गए। मछेन्द्रनाथ के पुत्र (शिष्य) गोरक्षनाथ कहते है की इस प्रकार से हमने अपने मूल अविचल स्वरुप को प्राप्त कर लिया ( यानी स्थिर रुप से अपने शाश्वत परमात्म स्वरुप मे स्थित हो गए)।

द्वादसी त्रिकुटी यला पिंगुला, चवदसि चित मिलाई।१।
षोड़स कवलदल सोल बतीसौ, जुरा मरन भौ गमाई।२।

महायोगी गोरख कहते है की अवस्था सिद्धि से इडा – पिंगला व सुषुम्ना का त्रिकुटी में मेल हो जाता है और योगी की चितवृति ब्रह्म मे लय कर जाती है। योगी षोड़श दल कमल (विशुद्ध चक्र) की सिद्धता को पाकर योग के बतीसो लक्षण प्रकट कर देता है ( यौगिक कलाओ से संयुक्त हो जाता है) और ऐसी तुरीय अवस्था मे जरा – मरण की भवभीति का सर्वरुप से क्षय हो जाता है ( योगी कालजयी व मायाजीत अवस्था को पा लेता है )।

पांच सहंस मैं षट अपूठा, सप्त दीप अष्ट नारी।१।
नव षंड पृथी इकबीस मांहीं, एकादसि एक तारी।२।

महायोगी गोरख कहते है की जब योगी के घट मे उस परम सता का प्राकटय होता है तो पंचमी स्थिति होकर वृति पलट जाती है ( यानी योगी की चेतना सहस्त्रार मे स्थित हो जाती है और उसकी प्रवृति बर्हिमुखी से अंर्तमुखी हो जाती है)। योगी के अन्तर मे परम का दीप जल उठता है और कुंडलिनी शक्ति सिद्ध हो जाती है। योगी नौखंड व २१ ब्रह्मांडो का अपने घट मे दर्शन करते हुए, परम एकरस शून्य समाधी मे लीन हो जाता है।

मन पवन अगम उजियाला, रवि ससि तार गयाई।१।
तीनि राज त्रिविधि कुल नांहिं, चारि जुग सिधि बाई।२।

महायोगी गोरख कहते है की मन व पवन का संतुलन साधकर जब योगी सार संयम को पाता है तो अगम की ज्योत उसमे चेतन हो उठती हेै, इस ज्योति के सामने सूर्य, चन्द्र और तारे भी छिप जाते हेै। गोरखनाथ जी का कथन है की ऐसी अवस्था मे योगी के लिए त्रिगुणात्मक रुप से व्याप्त माया का यह सकल पसारा शेष नही बचता ( योगी की चेतना इसके पार स्थित हो जाती है) और चौथे लोक मे उसकी सिद्धता का डंका बजता है ( योगी परम निर्लेप अवस्था मे स्थित हो जाता है)।

इन्हें भी देखे: