गोरख वाणी -गुरु शिष्य संवाद

गोरख वाणी संग्रह

श्री गुरु शिष्य शंका समाधान

गोरख उवाच

स्वामीजी तुम गुरु गोसाईं, अम्हेज शिष शब्द एक बूझिबा दया करि कहबा, मन कुनि करि बाशेसे |

आरम्भ चेला कैसे करि रहै? सतगुरु होय सो पूछयां कहे। ||

भावार्थ-गोरखनाथजी अपने श्री गुरुदेव से पूछते हैं कि स्वामीजी ! मैं एक शब्द शिष्य होकर पूछता हूं जिसका उत्तर कृपा कर कहो-यह मन कैसे वश में होता है ? शिष्य को प्रारम्भ में साधक अवस्था में कैसे रहना चाहिए ? शिष्य के प्रश्नों का सत्य उत्तर देवें वही सतगुरु है।

 

श्री मच्छन्द्र उवाच

अवधू रहबा तो हाटों बाटाँ, रूख वृक्ष की छाया ।

तजि बातों काम क्रोध लोभ मोह संसार की माया ।

आप सू गोष्ठि अनन्त विचार निद्रा अल्प अहार ।

आरंभ चेला ऐसे रहै, गौरख सुणो मछन्द्र कहै।॥

भावार्थ—हे शिष्य ! साधक को चाहिए कि आरम्भिक अवस्था में किसी एक जगह जगत-प्रपची पुरुषों में न रहे और मार्ग, धर्मशाला या किसी वृक्ष की छाया में विश्राम करे और संसार की संसृति, ममता, ग्रहंता, कामना, क्रोध, मोह, लोभ वृत्ति की , धारणाओं को त्याग कर अपने आत्म तत्व का चितन करे । कम भोजन तथा निद्रा आलस्य को जीतकर रहे । ‘

गोरख उवाच

स्वामोजी ! कोण देखना कोण विचारना,

कोण तत्त ले धरिवा सार ।

कोण देश सस्तक मुडाईया,

कौण ज्ञान ले उतरवा पार ||||

भावार्थ-हे गुरु ! साधक को क्या देखना ? क्या विचार करना, किस तत्व में वास करना, किसके लिये सिर मुड़ा कर किस ज्ञान को लेकर पार उतारना चाहिए। ||

श्री मच्छन्द्र उवाच

अवधू आपा देखिबा, अनंत विचारवा, तत्त लेो धरिवा सार ।

गुरु का शब्द ले मस्तक मुडाइबा,ब्रह्म ज्ञान ले उतरब पार।||

 

भावार्थ-हे शिष्य ! अपने आप को देखना, अनंत अगोचर को विचारना और तत्व-स्वरूप में वास करना, गुरु-नाम सोहंशब्द ले मस्तक मुडावे तथा ब्रह्मज्ञान को लेकर भवसागर पार उतरना चाहिए।

गोरख उवाच

स्वामीजी मन का कौण रूप, पवन का कौण आकार ।

दम की कौण दशा, साधिबा कौण द्वार ।।

भावार्थ-हे गुरु ! मन का स्वरूप क्या है ? पवन का आकार क्या है ? प्राणों की दशा क्या है ? और किस द्वार की । साधना करनी चाहिए?

श्री मच्छन्द्र उवाच

अवधू मन का शुन्य रूप, पवन का निरालंब आकार ।

दम की अलख दशा, सधिवा दसवें द्वार ।।

भावार्थ- हे शिष्य ! मन का शून्य रूप है, पवन का निराकार आकार है, दम की अलेख दशा और दशवें द्वार की साधना करनी चाहिए।

गोरख उवाच

स्वामीजी ! कोण पड़े बिन डाल, कौण पंख बिन सूआ।

कोण पाल बिन नार, कौण बिन कोल मूआ ।|

भावार्थ-हे गुरु ! जड़ के बिना डाल क्या है, पांखों के बिना पक्षी कौन है ? किनारे बिना नारि कौन है ? और काल बिना कौन मर सकता है ?

 

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