अस्थल बोहर मठ का संक्षिप्त इतिहास

अस्थल बोहर मठ का संक्षिप्त इतिहास

सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी के विषय में अनेक कथाएं प्रचलित हैं उन सभी में यह समान रुप से स्वीकार किया गया है कि यह सियालकोट के राजा ‘शालीवाहन’ की बड़ी रानी के सुपुत्र थे | इनकी विमाता, छोटी रानी, इनकी रूप-संपदा पर रीझ गई| छोटी रानी ने राजकुमार से अपनी वासना तृप्ति का अनुरोध किया पर उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया| इस पर छोटी रानी ने राजा के सामने उल्टे राजकुमार पर ही यह आरोप लगा दिया कि उसने उन पर कुदृष्टि डाली है और उनके शील भंग की कुचेष्टा की है|
राजा शालीवाहन ने छोटी रानी की शिकायत से क्रुद्ध होकर राजकुमार के हाथ-पांव कटवाकर उसे सियालकोट नगर से बाहर एक कुएं में डलवा दिया|
राजकुमार हाथ-पांव काट दिए जाने पर ‘चौरंगी’ बने कुएं में पड़े रहे |वहां एक महासिद्ध ‘योगी’ आए, उनकी कृपा से राजकुमार को पुनः हाथ-पांव मिले और इस प्रकार ‘पूर्णावयवी’ बन जाने से यह ‘पूरण भगत’ कहलाए|
सियालकोट नगर से बाहर, 5 मील की दूरी पर अब भी एक कुआं वर्तमान में है लोग उस कुएं को इन्ही पूरण भगत से सम्बद्ध, पूरण भगत वाला कुआ के नाम से पुकारते हैं | उस कुएं के पास एक गांव भी आबाद है उस गांव का नाम भी ‘पूरणवाला’ ही है|
पूर्ण भगत वाले कुए के विषय में यह ख्याति है कि उस कुएं के जल में घाव भरने की अद्भुत क्षमता है और उस कुएं पर स्नान करने से निसंतान महिलाओं को संतान प्राप्त हो जाती है इसी आस्था के कारण अब भी सहस्त्रो महिलाएं उस कुएं पर स्नान किया करती हैं|
हाथ पैर कटे पड़े ‘चौरंगी’ को योग बल से हाथ पांव प्रदान कर, पूर्णावयवी बनाने वाले महा सिद्ध योगी स्वयं श्री गोरखनाथ जी ही थे यह मान्यता श्रुति परंपरा से समूचे ‘नाथ संप्रदाय’(भेख) में चली आ रही है मराठी भाषा से अनूदित ‘योगिसम्प्र्दायाविश्कृति’ नामक पौराणिक ग्रंथ तथा लोक संगीत की अनेक पुस्तकों में भी यह प्रसंग इसी रूप में आया है और हरियाणा पंजाब तथा राजस्थान आदि राज्यों में प्रचलित लोकगीतों एवं लोककथाओं में भी इस संदर्भ का इसी प्रकार वर्णन किया जाता है |
पूरण भगत ही योगी संप्रदाय में दीक्षित होकर तप साधना के प्रभाव से अत्यंत तेजस्वी महा सिद्ध श्री चौरंगीनाथ हुए जिन्होंने हठ योग की साधना कर महाकाल के काल दंड को खंडित कर दिया और सदा के लिए अजर अमर हो गए |
महा सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी की पुनीत तपस्थली होने का सौभाग्य वर्तमान अस्थल बोहर मठ को प्राप्त है सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी ने 8 वीं सदी में यही पर हठ योग की साधना की थी और अपना लोक विश्रुत मठ स्थापित कर यहीं पर ‘पाद पंथ’ प्रवर्तित किया था यही ‘पाद पंथ’ आगे चलकर पावपंथ, पागलपंथ, अथवा गलपंथ, के नाम से प्रख्यात हुआ |
‘पाद पंथ’ की साधना में साधक को भूमि पर सिर रखकर तथा आकाश की ओर पांव करके शीर्षासन की विधि से तपस्या करनी पड़ती है यह हठ योग की साधना प्रक्रियाओं में से ही एक है इस साधना विधि को ‘सद्यः सिद्धि प्रदा’ कहकर इसकी प्रशंसा की गई है |
महा सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी के समय में अस्थल बहर का यह मठ अतीव समृद्धि था यहां से सिद्धों की चौरासी पालकियां धर्म प्रचार के लिए एक साथ चला करती थीं यह किम्वदन्ती यहां की जनता में इस समय तक प्रचलित है |
सूक्ष्म रीति से देखने पर कई एक तथ्य अब भी ऐसे उपलब्ध होते हैं जिनसे प्रचलित जन-श्रुतियों का साधार होना सिद्ध होता है प्रथम यह कि इस मठ में अब तक हठयोग के साधन उपलब्ध होते हैं दूसरे योगीसंप्रदायाविष्कृति में वर्णित यह विख्यात देवालय नामक तालाब यहां इस समय तक प्राप्त रहा है जिसकी पावन मिट्टी को निकालकर महा सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी के समय में रोगी जन रोगमुक्त हो जाया करते थे इस समय तक उक्त तालाब से मिट्टी निकालकर व्याधि मुक्ति होने की मान्यता भेख तथा जन साधारण में प्रचलित रही है और सहस्त्रों व्याधिग्रस्त जन इस समय तक ऐसा करके रोगमुक्त होते रहे हैं|
यद्यपि पूर्ण भगत को योगेश्वर श्री गोरखनाथ जी का शिष्य माना जाता है परंतु तिब्बत की परंपरा में सिद्ध चौरंगीपा अर्थात सिद्ध चौरंगीनाथ को मीनपा अर्थात सिद्ध मत्स्येन्द्रनाथ जी का शिष्य तथा सिद्ध गोरक्षपा (सिद्ध गोरखनाथ) जी का गुरु भाई ही बतलाया गया है इस तथ्य को पुष्टि करने वाले अनेक ग्रंथ तिब्बत के तंजूर नामक स्थान पर स्थित बौद्ध मठ से प्राप्त कर महापंडित राहुल सांकृत्यायन भारत में लाए हैं |
भारतवर्ष के प्रचलित साहित्य में भी अनेक ऐसे प्रमाण मिलते हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि सिद्ध चौरंगी नाथ जी सिद्ध श्री मच्छिंद्रनाथ जी के शिष्य तथा महा सिद्ध गुरु गोरखनाथ जी के गुरु भाई ही थे | इन प्रमाणों में से कई प्रमाण ऐसे प्रबल तथा महत्वपूर्ण है कि उन्हे दृष्टि से ओझल करना इतिहास की दृष्टि से अनुचित प्रतीत होता है |
संक्षेप में उन प्रमाणों पर यहां दृष्टिपात करना वांछनीय होगा ‘हठयोग प्रदीपिका’ संप्रदाय का सर्वमान्य ग्रंथ है | उसमें महासिद्धों की परंपरा का वर्णन करते हुए उसके प्रथम उपदेश के पांचवें तथा नवें श्लोक में लिखा है :-
श्री आदिनाथ मत्स्येंद्र शाबर आनंदभैरवा |
चौरंगी मीन गोरक्षा विरुपाक्ष विलेशया| |
इत्यादयो महा सिद्धा हठयोग प्रभावत |
खंडयित्वा कालदंड ब्रह्मांडे विचरंति ||
“किसी समय भगवान आदिनाथ के योग विद्या प्राप्त कर भूमंडल का भ्रमण करते हुए श्री सिद्ध मच्छिंद्रनाथ जी की दृष्टि हाथ पांव कटे चौरंगी पर पड़ी उनकी कृपा दृष्टि पढ़ने मात्र से ‘चौरंगी’ के हाथ-पांव अंकुरित हो गए! ‘चौरंगी’ इन्ही की कृपा से मुझे हाथ पांव मिले हैं यह मानकर सिद्धि मत्स्येन्द्रनाथ जी के चरणों में गिर पड़ा उसने उनसे विनय की कि आप मुझ पर कृपा कीजिए मत्स्येन्द्रनाथ जी ने भी उन पर कृपा की और उन के अनुग्रह से ही चौरंगी नाथ प्रसिद्ध हुए |
इतना ही नहीं मूल ग्रंथ में तो सिर्फ चौरंगी नाथ जी की उन महासिद्धों में गणना की गई है जिन्होंने हट योग की साधना कर यमराज के मृत्यु दंड को टुकडे टुकडे कर फेंक दिया और जो सदा के लिए अजर अमर हो ब्रह्मांड में विचरण कर रहे हैं |
स्पष्ट है कि श्री ब्रह्मानंद सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी को सिद्ध श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी का शिष्य स्वीकार करते हैं और इस प्रकार सिद्ध संप्रदाय के इस परम प्रमाणिक ग्रंथ के आधार पर भी सिद्ध चौरंगी नाथ जी सिद्ध श्री गोरखनाथ जी के गुरु भाई ही प्रमाणित होते हैं |
इतना ही नहीं इसके अतिरिक्त संत ज्ञानदेव जी ने भी अपनी ज्ञानेश्वरी में भी इस प्रसंग में निम्न भांति लिखा है :-
श्री चौरंगीनाथ नामक कोई महात्मा हाथ पांव कटे पड़े थे उन्हें हस्तपादादिक अंग देकर श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी ने पूर्णावयवी बनाया |
संत ज्ञानदेव जी सिद्ध निवृत्ति नाथ जी के शिष्य थे और उन्हीं के सगे भाई भी थे | वह आयु में भी उनसे मात्र 2 वर्ष ही छोटे थे |
सिद्ध निवृत्ति नाथ जी सिद्धि गहनी नाथ जी के शिष्य तथा सिद्ध गोरख नाथ जी के प्रशिष्य थे इस प्रकार सिद्ध श्री गोरखनाथ जी तथा सिद्ध श्री निवृत्तीनाथ जो अथवा संत ज्ञानदेव जी के समय में एक ही पीढ़ी सिद्ध श्री गहनी नाथ जी का अंतर है इतने थोड़े समय में ऐतिहासिक तथ्य विकृत हो जाए पर इस पर विश्वास करना कठिन है |

 

इस संदर्भ में एक अकाट्य प्रमाण है श्री सिद्ध चौरंगी नाथ जी की लिखी ‘प्राण सांकली’ नामक पुस्तक है मूल रूप में जैन ग्रंथागार पिंडी में सुरक्षित है अब इसे काशी नगरी प्रचारिणी सभा वाराणसी ‘ नाथ सिद्धों की बानियाँ ‘ के अंतर्गत प्रकाशित करवाया है इसमें यह सर्वसाधारण को सुलभ हो गई है |
“प्राण-सांकली में श्री सिद्ध चौरंगीनाथ जी ने अपने को राजा शालीवाहन का बेटा सिद्ध श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी का शिष्य तथा गुरु श्री गोरख नाथ जी का गुरु भाई बताया है इस महत्वपूर्ण संदर्भ पुस्तिका से यह भी पता चलता है कि इनके हाथ पांव कटा दिए गए थे जो सिद्ध मत्स्येंद्र नाथ जी की कृपा से इन्हें पुनः प्राप्त हुए इस प्रकार यह ही बहुचर्चित ‘पूरण भगत’ है यह सिद्ध हो जाता है |
प्राण संगली के उक्त संदर्भों से सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी के संबंध में अनेक तथा अन्य तथ्य भी प्रकाश में आए हैं इससे यह भी पता चलता है कि सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी श्री गोरखनाथ जी का घनिष्ठ संबंध था यहां तक कि सिद्ध श्री गोरखनाथ जी ने सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी के निमित्त निरंतर बारह वर्ष योग साधना (तपश्चर्या की थी इतना ही नहीं सिद्ध श्री गोरखनाथ जी सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी को इतने स्नेह से खिलाते पिलाते थे कि सिद्धश्री चौरंगीनाथ जी ने भाव विह्वल हो कर उंहें अपना अन्नदाता कहकर आत्मसंतोष अनुभव किया तथा उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन किया था |
प्राण सांकली से स्पष्ट है कि श्री चौरंगी नाथ जी सिद्ध श्री गोरखनाथ जी से दीक्षा क्रम में वरिष्ठ रहे हैं तभी तो वह कहते हैं कि सिद्ध श्री गोरखनाथ जी ने उनसे जीवन उपाय पूछा था साथ ही वह इसमें भी अपने सखा का उपकार ही मानते हैं क्योंकि इस घटना से पूर्व कोई भी इन्हें परम गोसाई अर्थात महासिद्ध नहीं मानता था वे मुक्त कंठ से स्वीकार करते हैं कि इसके बाद ही उनकी अपनी शिष्य परम्परा विकसित हुई उनका नाम त्रिभुवन में फैला और उन्होंने अपने आपको (अर्थात अपने सामर्थ्य को ) पहचाना |
सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी सिद्ध श्री गोरखनाथ जी से ज्येष्ठ थे इस संबंध में कई अन्य प्रमाण भी उपलब्ध हैं |
‘हठयोगप्रदीपिका’ ने अपना प्रथम उपदेश के पांचवे से नवें श्लोक तक महा सिद्धों की गणना करते हुए उनकी गरिमा का वर्णन किया है इस प्रसंग में सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी का नाम गणना कर्म की पांचवी संख्या पर लिखा गया है तो सिद्ध गोरख नाथ जी का उल्लेख सातवें क्रम पर है ऐसा मात्र पद्य रचना की दृष्टि से नहीं अपितु सिद्धों के वरिष्ठता का क्रम के अनुसार किया गया प्रतीत होता है |
शैव तथा शाक्त परंपरा के सिद्धों के घटना क्रम में भी जहां महा सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी का नाम चतुर्थ क्रमांक पर मिलता है वहां सिद्ध श्री गोरखनाथ जी का नाम इस गणना क्रम में बहुत आगे चलकर आता है |
‘नाथ संप्रदाय’ में ‘नवनाथों’ के गणना क्रम में सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी का “ज्ञान पारगी(खी)ज्ञान परीक्षक सिद्ध श्री ‘चौरंगी नाथ’ जी इस भांति प्रतिष्ठात्मक उल्लेख मिलता है वहां पर सिद्ध श्री गोरखनाथ जी का उल्लेख नहीं है यह भी पुष्टि करता है कि सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी इनसे जेष्ठ थे |
सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी द्वारा स्थापित अस्थल बोहर का वर्तमान मठ नाथ संप्रदाय की बड़ी दरगाह अथवा महान तीर्थ के रूप में मान्य है यह तथ्य भी यही ध्वनित करता है कि इसके संस्थापक निश्चय ही संप्रदाय में वरिष्ठता क्रम में सर्वमान्य रहे हैं और उनकी श्रेष्ठता को सम्मान प्रदान करने के लिए संप्रदाय(भेख) में उनके साधना स्थल को यह गौरव प्राप्त हुआ है |

भारत के समुचे साधु समाज में सदा से ही यह प्रथा प्रचलित है कि जो साधु पहले दीक्षा ग्रहण करता है वह बाद में दीक्षा ग्रहण करने वाले से ज्येष्ठ माना जाता है और कनिष्ठ से सम्मान प्राप्त करने का अधिकारी होता है नाथ संप्रदाय में भी यही प्रथा प्रचलित है |
इस समस्त विवेचन से यह सिद्ध हो जाता है कि महासिद्ध चौरंगी नाथ जी निश्चय ही दीक्षा क्रम में योगेश्वर श्री युत गोरखनाथ जी से ज्येष्ठ थे |
आगे चलकर समूचे नाथ संप्रदाय ने महामहिम मंडित व्यक्तित्व के धनी सिद्ध श्री गोरखनाथ जी को समूचे संप्रदाय के आचार्य तथा प्रवर्तक मान कर उंहें श्रद्धा तथा सम्मान के सर्वोच्च शिखर पर आसीन किया उन्होंने भेख में प्रचलित अनेक कुरीतियों को समाप्त करने का गहन गंभीर प्रयत्न कर इसे सर्वथा शुद्ध परिष्कृत तथा परिमार्जित किया इससे उनका व्यक्तित्व और भी अधिक निखरा और चमका | उनकी यश प्रभा चारों ओर फैल गई और संप्रदाय के यही सर्वमान्य, सर्वपूज्य आचार्य मान्य होने लगे |
इस समूह से विवेचन से यह सिद्ध होता है कि सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी सिद्ध श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी के शिष्य तथा सिद्ध श्री गोरखनाथ जी के गुरु भाई थे तथा संप्रदाय के दीक्षा कर्म में श्री गोरखनाथ जी से ज्येष्ठ थे |

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