बाबा मस्तनाथ मठ गद्दी नशीन महन्त चाँदनाथ योगी हुए ब्रह्मलीन

अध्यात्म और शिक्षा के महान् पुँज का देहावसान अपूरणीय क्षति

बाबा मस्तनाथ मठ गद्दी नशीन महन्त चाँदनाथ योगी हुए ब्रह्मलीन

                विधेयम् जन सेवनम् की भावना को सिरमौर बनाने वाले अपने गुरु आदर्शों पर चलकर शिक्षा की ज्योति को चहुँ ओर प्रकाशित करने वाले प्रकाश पुँज बाबा मस्तनाथ मठ अस्थल बोहर के मठाधीश एवं सांसद अलवर ने मानव सेवा के रूप में स्वयं को इस प्रकार से रचाया बसाया कि आज उनके अन्तिम दशनार्थ पूरा नाथ सम्प्रदाय तथा नाथ सम्प्रदाय में पूर्ण विश्वास रखने वाले लोगों की अपार भीड़ मठ अस्थल बोहर में जमा हुई। महन्त श्रेयोनाथ जी के दिए गए दिशा-निर्देशों को अपने जीवन का ध्येय मानकर अपना पूरा जीवन शिक्षा के उत्थान में समर्पित करते हुए आज अल सुबह (रात्रि) 12:30 बजे अपोलो अस्पताल दिल्ली में महन्त चाँदनाथ जी ने अपनी अन्तिम साँस ली। अपनी बीमारी के मध्यनजर 29 जुलाई, 2016 को बाबा बालकनाथ जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए उन्होंने नाथ सम्प्रदाय में गुरु शिष्य परम्परा को आगे बढ़ाया। 7 जनवरी, 1984 को जब अपने गुरु श्रेयोनाथ जी के पश्चात् महन्त चाँदनाथ जी ने मठ अस्थल बोहर से नाथ सम्प्रदाय का कार्यभार सम्भाला तभी से अपने दृढ़ लक्ष्य के प्रति समर्पित रहते हुए नित नए आयामों को स्थापित किया। पिता मोहर सिंह तथा माता चम्पा देवी की सबसे बड़ी सन्तान के रूप में महन्त चाँदनाथ का जन्म 21 जून, 1956 को बेगमपुर दिल्ली के एक साधारण परिवार में हुआ। सात भाई-बहनों के परिवार में चाँद राम के रूप में जन्में बच्चे के आध्यात्मिक लक्षण बचपन में ही दिखाई देने शुरु हो गए। उनके सबसे छोटे भाई उदयभान जो भारतीय आर्मी से सूबेदार मेजर के पद से अभी 1 जुलाई, 2017 को सेवानिवृत्त हुए ने बताया कि पिता जी इनके दैवीय गुणों का ज्ञान युवा अवस्था में हो चुका था। जब वे खेतों में फसल बीजने जाते तो इनके द्वारा रोपित बीजों से उत्पन्न फसल एक अलग ही रंग रूप और पकाव को ग्रहण करती तथा जब कभी चाँदनाथ जी को बीज या और सामान लाने बाजार भेजा जाता तो सामान न मिलने पर उस पैसे से वे साधु-सन्तों के भोजन आदि की व्यवस्था कर आते तथा साधु-सन्तों की मण्डली में उनका मन खूब रमता। दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी ऑनर्स में स्नातक करने के पश्चात् वे अध्यात्म की अपनी भूख को पूर्ण करने साधु-सन्तों के पास जाने लगे। अपने समय में कॉलेज की क्रॉस कन्टरी रेस प्रतिभागी रहे चाँदराम को श्रीयुत् श्रेयोनाथ जी का सान्निध्य मठ अस्थल बोहर में प्राप्त हुआ और बस यही से उनका आध्यात्मिक मार्ग आरम्भ हो गया। इनके तीन भाई सिंहराम, तारीफ सिंह तथा उदयभान है जिनमें से तारीफ सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं। सिंहराम आज भी नांगलोई डी.टी.सी. में ड्राईवर है। तीन बहने सत्यावती (जो बागपत में शादी शुदा) उषा तथा रोशनी (पानीपत में शादी शुदा है)। महन्त श्रेयोनाथ जी के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर आगे बढ़ते हुए उनके 150 शिष्यों में से महन्त चाँदनाथ ने अपना एक विशेष स्थान बनाया और आज अपने सभी गुरु भाइयों को अलविदा कह वे ब्रह्मलीन हो गए। अपने 31 वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने मस्तनाथ शिक्षण संस्थान के रूप में विश्वविद्यालय तक का सफर पूर्ण किया। अपने गुरु जी की याद में उन्होंने बाबा मस्तनाथ मठ का जीर्णोद्धार अक्षरधाम मन्दिर की तर्ज पर 15 जुलाई, 2010 को आरम्भ करवाया जिसमें बाबा रामदेव, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा जैसी शख्सियतों ने भाग लिया। समाज सेवा के दूसरे क्षेत्र राजनीति को भी महन्त चाँदनाथ जी ने रोशन किया। 2004 से 2008 तक बहरोड़ राजस्थान से एम.एल.ए. तथा वर्तमान में 2014 से अलवर से एम.पी. बनकर राजनीति में भी अपने गुरु जी के पदचिह्नों पर चलकर समाज सेवा की। अपने खराब स्वास्थ्य के कारण योगी आदित्यनाथ जी की उपस्थिति में 29 जुलाई, 2016 को अपने प्रिय शिष्य बाबा बालकनाथ को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। लम्बे समय से कैंसर से लड़ते हुए रात्रि 12:30 पर उन्होंने अपनी अन्तिम साँस ली। समाज के इस पुँज की पूर्ति करना असम्भव है। योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में अखिल भारतीय नेक महासभा के उपाध्यक्ष रूप में भी कार्यरत हुए। महन्त चाँदनाथ ने अपने कार्यों द्वारा सम्पूर्ण समाज को सदैव उत्तम मार्ग दिया। इस महान् आत्मा को अन्तिम विदाई देने के लिए हरियाणा सरकार का प्रशासन, राजस्थान प्रशासन, उत्तरप्रदेश प्रशासन उमड़ पड़ा। आज महन्त चाँदनाथ जी के अन्तिम विदाई कार्यक्रम में पूरे विधि-विधान के साथ नाथ सम्प्रदाय के साधु-सन्तों ने पालकी में उन्हें बैठाकर फूल मालाओं से पूरी तरह सुसज्जित करके सर्वप्रथम स्वयं नमस्कार किया। तत्पश्चात् अनेकों सम्मानीय व्यक्तियों ने अपनी श्रद्धांजलि दी जिनमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जी, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया जी, हरियाणा बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला, शिक्षा मंत्री राम बिलास शर्मा, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, राजस्थान के विधायक रामहेत यादव, बनवारी लाल, धर्मपाल चौधरी, मामन सिंह, हरियाणा से विधायक श्री कृष्ण हुड्डा, श्री मनीष ग्रोवर, गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज, जिला परिषद् चेयरमैन बलराज कुण्डू, कपिलपुरी जी महाराज, बाबा जितेन्द्र पाल सौढी, कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर, आप पार्टी से नवीन जयहिन्द, जिला बीजेपी अध्यक्ष अजय बंसल, मनमोहन गोयल, लवलीन टुटेजा, कपिल नागपाल, सुशील गुप्ता (पोपट), अलवर से पूर्व सांसद कंवर जितेन्द्र सिंह, बीजेपी के जनरल सेके्रटरी भूपेन्द्र यादव, पूर्व एस.पी. रोहतक राजेश दुग्गल, सुनीता दुग्गल, बीजेपी नेत्री प्रतिभा सुमन, मीरपुर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार मदन गोयल सहित पूरा प्रशासनिक अमला उपस्थित रहा। महन्त जी को पालकी में बैठाकर गीता भवन से बाहर लाया गया तथा बाबा मस्तनाथ जी के दर्शनों के पश्चात् पूरे विधि-विधान से उन्हें समाधि दी गई। पालकी को स्वयं मुख्यमंत्री हरियाणा सरकार तथा मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अपने कन्धों पर उठाकर आध्यात्म के इस महान् स्तम्भ को भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए न केवल पूरे नाथ सम्प्रदाय के लिए अपितु पूरे भारत वर्ष के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया।

 

 

अस्थल बोहर मठ का संक्षिप्त इतिहास

                सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी के विषय में अनेक कथाएं प्रचलित हैं उन सभी में यह समान रूप से स्वीकार किया गया है कि यह सियालकोट के राजा ‘शालीवाहन’ की बड़ी रानी के सुपुत्र थे। इनकी विमाता, छोटी रानी, इनकी रूप-संपदा पर रीझ गई। छोटी रानी ने राजकुमार से अपनी वासना तृप्ति का अनुरोध किया पर उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। इस पर छोटी रानी ने राजा के सामने उल्टे राजकुमार पर ही यह आरोप लगा दिया कि उसने उन पर कुदृष्टि डाली है और उनके शील भंग की कुचेष्टा की है। राजा शालीवाहन ने छोटी रानी की शिकायत से कु्रद्ध होकर राजकुमार के हाथ-पाँव कटवाकर उसे सियालकोट नगर से बाहर एक कुएँ में डलवा दिया। राजकुमार हाथ-पांव काट दिए जाने पर ‘चौरंगी’ बने कुएं में पड़े रहे। वहां एक महासिद्ध ‘योगी’ आए, उनकी कृपा से राजकुमार को पुन: हाथ-पांव मिले और इस प्रकार ‘पूर्णावयवी’ बन जाने से यह ‘पूरण भगत’ कहलाए। सियालकोट नगर से बाहर, 5 मील की दूरी पर अब भी एक कुआं वर्तमान में है लोग उस कुएं को इन्ही पूरण भगत से सम्बद्ध, पूरण भगत वाला कुआ के नाम से पुकारते हैं। उस कुएं के पास एक गांव भी आबाद है उस गांव का नाम भी ‘पूरणवाला’ ही है। पूर्ण भगत वाले कुएँ के विषय में यह ख्याति है कि उस कुएँ के जल में घाव भरने की अद्भुत क्षमता है और उस कुएं पर स्नान करने से नि:संतान महिलाओं को संतान प्राप्त हो जाती है इसी आस्था के कारण अब भी सहस्त्रो महिलाएँ उस कुएं पर स्नान किया करती हैं। हाथ पैर कटे पड़े ‘चौरंगी’ को योग बल से हाथ पांव प्रदान कर, पूर्णावयवी बनाने वाले महासिद्ध योगी स्वयं श्री गोरखनाथ जी ही थे यह मान्यता श्रुति परंपरा से समूचे ‘नाथ संप्रदाय’ (भेख) में चली आ रही है मराठी भाषा से अनूदित ‘योगिसम्प्र्दायाविष्कृति’ नामक पौराणिक ग्रंथ तथा लोक संगीत की अनेक पुस्तकों में भी यह प्रसंग इसी रूप में आया है और हरियाणा पंजाब तथा राजस्थान आदि राज्यों में प्रचलित लोकगीतों एवं लोककथाओं में भी इस संदर्भ का इसी प्रकार वर्णन किया जाता है। पूरण भगत ही योगी संप्रदाय में दीक्षित होकर तप साधना के प्रभाव से अत्यंत तेजस्वी महासिद्ध श्री चौरंगीनाथ हुए जिन्होंने हठ योग की साधना कर महाकाल के काल दंड को खंडित कर दिया और सदा के लिए अजर अमर हो गए। महासिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी की पुनीत तपस्थली होने का सौभाग्य वर्तमान अस्थल बोहर मठ को प्राप्त है। सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी ने 8वीं सदी में यही पर हठ योग की साधना की थी और अपना लोक विश्रुत मठ स्थापित कर यहीं पर ‘पाद पंथ’ प्रवर्तित किया था यही ‘पाद पंथ’ आगे चलकर पावपंथ, पागलपंथ, अथवा गलपंथ, के नाम से प्रख्यात् हुआ। ‘पाद पंथ’ की साधना में साधक को भूमि पर सिर रखकर तथा आकाश की ओर पाँव करके शीर्षासन की विधि से तपस्या करनी पड़ती है यह हठ योग की साधना प्रक्रियाओं में से ही एक है इस साधना विधि को ‘सद्य: सिद्धि प्रदा’ कहकर इसकी प्रशंसा की गई है। महासिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी के समय में अस्थल बोहर का यह मठ अतीव समृद्ध था यहाँ से सिद्धों की चौरासी पालकियाँ धर्म प्रचार के लिए एक साथ चला करती थीं यह किम्वदन्ती यहाँ की जनता में इस समय तक प्रचलित है। सूक्ष्म रीति से देखने पर कई एक तथ्य अब भी ऐसे उपलब्ध होते हैं जिनसे प्रचलित जन-श्रुतियों का साधार होना सिद्ध होता है प्रथम यह कि इस मठ में अब तक हठयोग के साधन उपलब्ध होते हैं दूसरे योगीसंप्रदायाविष्कृति में वर्णित यह विख्यात् देवालय नामक तालाब यहाँ इस समय तक प्राप्त रहा है जिसकी पावन मिट्टी को निकालकर महासिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी के समय में रोगी जन रोगमुक्त हो जाया करते थे इस समय तक उक्त तालाब से मिट्टी निकालकर व्याधि मुक्ति होने की मान्यता भेख तथा जन साधारण में प्रचलित रही है और सहस्त्रों व्याधिग्रस्त जन इस समय तक ऐसा करके रोगमुक्त होते रहे हैं। यद्यपि पूर्ण भगत को योगेश्वर श्री गोरखनाथ जी का शिष्य माना जाता है, परंतु तिब्बत की परंपरा में सिद्ध चौरंगीपा अर्थात सिद्ध चौरंगीनाथ को मीनपा अर्थात् सिद्ध मत्स्येन्द्रनाथ जी का शिष्य तथा सिद्ध गोरक्षपा (सिद्ध गोरखनाथ) जी का गुरु भाई ही बतलाया गया है इस तथ्य की पुष्टि करने वाले अनेक ग्रंथ तिब्बत के तंजूर नामक स्थान पर स्थित बौद्ध मठ से प्राप्त कर महापंडित राहुल सांकृत्यायन भारत में लाए हैं। भारतवर्ष के प्रचलित साहित्य में भी अनेक ऐसे प्रमाण मिलते हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि सिद्ध चौरंगीनाथ जी सिद्ध श्री मच्छिंद्रनाथ जी के शिष्य तथा महा सिद्ध गुरु गोरखनाथ जी के गुरु भाई ही थे। इन प्रमाणों में से कई प्रमाण ऐसे प्रबल तथा महत्त्वपूर्ण है कि उन्हे दृष्टि से ओझल करना इतिहास की दृष्टि से अनुचित प्रतीत होता है। संक्षेप में उन प्रमाणों पर यहाँ दृष्टिपात करना वांछनीय होगा ‘हठयोग प्रदीपिका’ संप्रदाय का सर्वमान्य ग्रंथ है। उसमें महासिद्धों की परंपरा का वर्णन करते हुए उसके प्रथम उपदेश के पाँचवें तथा नवें श्लोक में लिखा है-

श्री आदिनाथ मत्स्येंद्र शाबर आनंदभैरवा।

चौरंगी मीन गोरक्षा विरुपाक्ष विलेशया।।

इत्यादयो महा सिद्धा हठयोग प्रभावत।

खंडयित्वा कालदंड ब्रह्मांडे विचरंति।।

                ‘‘किसी समय भगवान् आदिनाथ के योग विद्या प्राप्त कर भूमंडल का भ्रमण करते हुए श्री सिद्ध मच्छिंद्रनाथ जी की दृष्टि हाथ पांव कटे चौरंगी पर पड़ी उनकी कृपा दृष्टि पढऩे मात्र से ‘चौरंगी’ के हाथ-पांव अंकुरित हो गए! ‘चौरंगी’ इन्ही की कृपा से मुझे हाथ पांव मिले हैं यह मानकर सिद्धि मत्स्येन्द्रनाथ जी के चरणों में गिर पड़ा उसने उनसे विनय की कि आप मुझ पर कृपा कीजिए मत्स्येन्द्रनाथ जी ने भी उन पर कृपा की और उनके अनुग्रह से ही चौरंगीनाथ प्रसिद्ध हुए। इतना ही नहीं मूल ग्रंथ में तो सिर्फ चौरंगीनाथ जी की उन महासिद्धों में गणना की गई है जिन्होंने हट योग की साधना कर यमराज के मृत्यु दंड को टुकड़े-टुकड़े कर फेंक दिया और जो सदा के लिए अजर अमर हो ब्रह्मांड में विचरण कर रहे हैं। स्पष्ट है कि श्री ब्रह्मानंद सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी को सिद्ध श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी का शिष्य स्वीकार करते हैं और इस प्रकार सिद्ध संप्रदाय के इस परम प्रमाणिक ग्रंथ के आधार पर भी सिद्ध चौरंगीनाथ जी सिद्ध श्री गोरखनाथ जी के गुरु भाई ही प्रमाणित होते हैं।’’ इतना ही नहीं इसके अतिरिक्त संत ज्ञानदेव जी ने भी अपनी ज्ञानेश्वरी में भी इस प्रसंग में निम्न भांति लिखा है-

श्री चौरंगीनाथ नामक कोई महात्मा हाथ पांव कटे पड़े थे उन्हें हस्तपादादिक अंग देकर श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी ने पूर्णावयवी बनाया।

संत ज्ञानदेव जी सिद्ध निवृत्ति नाथ जी के शिष्य थे और उन्हीं के सगे भाई भी थे। वह आयु में भी उनसे मात्र 2 वर्ष ही छोटे थे।

सिद्ध निवृत्ति नाथ जी सिद्धि गहनी नाथ जी के शिष्य तथा सिद्ध गोरखनाथ जी के प्रशिष्य थे इस प्रकार सिद्ध श्री गोरखनाथ जी तथा सिद्ध श्री निवृत्तीनाथ जो अथवा संत ज्ञानदेव जी के समय में एक ही पीढ़ी सिद्ध श्री गहनीनाथ जी का अंतर है इतने थोड़े समय में ऐतिहासिक तथ्य विकृत हो जाए पर इस पर विश्वास करना कठिन है। इस संदर्भ में एक अकाट्य प्रमाण है श्री सिद्ध चौरंगीनाथ जी की लिखी ‘प्राण सांकली’ नामक पुस्तक है मूल रूप में जैन ग्रंथागार पिंडी में सुरक्षित है अब इसे काशी नगरी प्रचारिणी सभा वाराणसी ‘नाथ सिद्धों की बानियाँ’ के अंतर्गत प्रकाशित करवाया है इसमें यह सर्वसाधारण को सुलभ हो गई है।

‘प्राण-सांकली में श्री सिद्ध चौरंगीनाथ जी ने अपने को राजा शालीवाहन का बेटा सिद्ध श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी का शिष्य तथा गुरु श्री गोरखनाथ जी का गुरु भाई बताया है इस महत्त्वपूर्ण संदर्भ पुस्तिका से यह भी पता चलता है कि इनके हाथ पांव कटा दिए गए थे जो सिद्ध मत्स्येंद्रनाथ जी की कृपा से इन्हें पुन: प्राप्त हुए इस प्रकार यह ही बहुचर्चित ‘पूरण भगत’ है यह सिद्ध हो जाता है। प्राण संगली के उक्त संदर्भों से सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी के संबंध में अनेक तथा अन्य तथ्य भी प्रकाश में आए हैं इससे यह भी पता चलता है कि सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी श्री गोरखनाथ जी का घनिष्ठ संबंध था यहाँ तक कि सिद्ध श्री गोरखनाथ जी ने सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी के निमित्त निरंतर बारह वर्ष योग साधना (तपश्चर्या की थी) इतना ही नहीं सिद्ध श्री गोरखनाथ जी सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी को इतने स्नेह से खिलाते पिलाते थे कि सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी ने भाव विह्वल होकर उन्हें अपना अन्नदाता कहकर आत्मसंतोष अनुभव किया तथा उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन किया था। प्राण सांकली से स्पष्ट है कि श्री चौरंगीनाथ जी सिद्ध श्री गोरखनाथ जी से दीक्षा क्रम में वरिष्ठ रहे हैं तभी तो वह कहते हैं कि सिद्ध श्री गोरखनाथ जी ने उनसे जीवन उपाय पूछा था साथ ही वह इसमें भी अपने सखा का उपकार ही मानते हैं क्योंकि इस घटना से पूर्व कोई भी इन्हें परम गोसाई अर्थात् महासिद्ध नहीं मानता था वे मुक्त कंठ से स्वीकार करते हैं कि इसके बाद ही उनकी अपनी शिष्य परम्परा विकसित हुई उनका नाम त्रिभुवन में फैला और उन्होंने अपने आपको (अर्थात् अपने सामथ्र्य को) पहचाना। सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी सिद्ध श्री गोरखनाथ जी से ज्येष्ठ थे इस संबंध में कई अन्य प्रमाण भी उपलब्ध हैं। ‘हठयोगप्रदीपिका’ ने अपना प्रथम उपदेश के पाँचवें से नवें श्लोक तक महा सिद्धों की गणना करते हुए उनकी गरिमा का वर्णन किया है इस प्रसंग में सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी का नाम गणना कर्म की पाँचवीं संख्या पर लिखा गया है तो सिद्ध गोरखनाथ जी का उल्लेख सातवें क्रम पर है ऐसा मात्र पद्य रचना की दृष्टि से नहीं, अपितु सिद्धों के वरिष्ठता का क्रम के अनुसार किया गया प्रतीत होता है। शैव तथा शाक्त परंपरा के सिद्धों के घटना क्रम में भी जहाँ महासिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी का नाम चतुर्थ क्रमांक पर मिलता है वहाँ सिद्ध श्री गोरखनाथ जी का नाम इस गणना क्रम में बहुत आगे चलकर आता है। ‘नाथ संप्रदाय’ में ‘नवनाथों’ के गणना क्रम में सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी का ‘ज्ञान पारगी (खी) ज्ञान’ परीक्षक सिद्ध श्री ‘चौरंगीनाथ’ जी इस भांति प्रतिष्ठात्मक उल्लेख मिलता है वहाँ पर सिद्ध श्री गोरखनाथ जी का उल्लेख नहीं है यह भी पुष्टि करता है कि सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी इनसे ज्येष्ठ थे। सिद्ध श्री चौरंगी नाथ जी द्वारा स्थापित अस्थल बोहर का वर्तमान मठ नाथ संप्रदाय की बड़ी दरगाह अथवा महान् तीर्थ के रूप में मान्य है यह तथ्य भी यही ध्वनित करता है कि इसके संस्थापक निश्चय ही संप्रदाय में वरिष्ठता क्रम में सर्वमान्य रहे हैं और उनकी श्रेष्ठता को सम्मान प्रदान करने के लिए संप्रदाय (भेख) में उनके साधना स्थल को यह गौरव प्राप्त हुआ है। भारत के समूचे साधु समाज में सदा से ही यह प्रथा प्रचलित है कि जो साधु पहले दीक्षा ग्रहण करता है वह बाद में दीक्षा ग्रहण करने वाले से ज्येष्ठ माना जाता है और कनिष्ठ से सम्मान प्राप्त करने का अधिकारी होता है नाथ संप्रदाय में भी यही प्रथा प्रचलित है। इस समस्त विवेचन से यह सिद्ध हो जाता है कि महासिद्ध चौरंगीनाथ जी निश्चय ही दीक्षा क्रम में योगेश्वर श्री युत गोरखनाथ जी से ज्येष्ठ थे। आगे चलकर समूचे नाथ संप्रदाय ने महामहिम मंडित व्यक्तित्व के धनी सिद्ध श्री गोरखनाथ जी को समूचे संप्रदाय के आचार्य तथा प्रवर्तक मानकर उन्हें श्रद्धा तथा सम्मान के सर्वोच्च शिखर पर आसीन किया उन्होंने भेख में प्रचलित अनेक कुरीतियों को समाप्त करने का गहन गंभीर प्रयत्न कर इसे सर्वथा शुद्ध परिष्कृत तथा परिमार्जित किया इससे उनका व्यक्तित्व और भी अधिक निखरा और चमका। उनकी यश प्रभा चारों ओर फैल गई और संप्रदाय के यही सर्वमान्य, सर्वपूज्य आचार्य मान्य होने लगे। इस समूह से विवेचन से यह सिद्ध होता है कि सिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी सिद्ध श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी के शिष्य तथा सिद्ध श्री गोरखनाथ जी के गुरु भाई थे तथा संप्रदाय के दीक्षा कर्म में श्री गोरखनाथ जी से ज्येष्ठ थे।

 

महान् कर्मयोगी योगिराज श्रीयुत महंत चांदनाथ जी योगी

                जिनके चरण कमल का स्मरण सम्पूर्ण बिघन समूह को नष्ट कर देता है मैं सरस्वती का ध्यान लगाकर तथा सिद्ध योगी बाबा मस्तनाथ जी का स्मरण कर सिद्ध बाबा मस्तनाथ स्वरूप योगी सिद्ध बाबा महन्त चाँदनाथ जी योगी की जीवन लीला का संक्षिप्त वर्णन आप लोगों के सामने कर रहा हूँ भगवान् गणेश माँ सरस्वती मेरे इस छोटे से प्रयास को सफल करें।

पूज्य महन्त चाँदनाथ योगी जी- जन्म एवं शिक्षा

दिल्ली के बेगमपुर गाँव में पिता श्री मोहर सिंह तथा माता श्रीमती चंपा देवी के संपन्न किसान परिवार में 21 जून, 1956 में एक दिव्या बालक का जन्म हुआ। सात भाई-बहनों में सबसे बड़े बालक की बुद्धि बचपन से ही कुशाग्र थी वह धर्म-कर्म में रुचि रखने वाला तथा तेजस्वी था। इस बालक का नाम इनके माता-पिता ने चाँद राम रखा। वही बालक बड़ा होकर महन्त चाँदनाथ जी के नाम से जाना गया। जिसने अपनी विशिष्ट कार्यशैली एवम् विशिष्ट व्यक्तित्व के द्वारा श्री बाबा मस्तनाथ जी की परम्परा को आगे बढ़ाया एवम् मठ का संरक्षक बना। महन्त चाँदनाथ जी ने हिन्दू कॉलेज दिल्ली से बी.ए. (आनर्स) की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की। स्नातक के पश्चात् 21 जनवरी, 1978 महा चौदस के दिन महन्त श्रेयोनाथ जी से दीक्षा ग्रहण की तथा उनके आदेश अनुसार थेहड़ी हनुमानगढ़ जाकर वहां का कार्य भार सम्भाला तथा 7 जनवरी, 1985 तक वे इसी क्षेत्र में कार्य करते रहे। उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा भी डॉक्टर की मानद उपाधि प्रदान की गई।

मेरे गुरुदेव की शिक्षा और उपलब्धियाँ-

गुरुदेव सिद्ध बाबा महन्त चाँदनाथ जी योगी

  1. 21 जून, 1956 में गाँव बेगमपुर मैं जन्म।
  2. 1977 में बी.ए. (आनर्स) की उपाधि।
  3. 21 जून, 1978 नाथ सम्प्रदाय की दीक्षा।
  4. 21 मई, 1984 रस्म चादर प्रक्रिया।
  5. 30 मई, 1984 को कानूनन वसीयत।
  6. 9 जून, 1985 गद्दी नशीन महन्त।
  7. 1986 में गुरु समाधि स्थल का निर्माण।
  8. 1987 में सिविल रोड पब्लिक स्कूल।
  9. 1988 में आवासीय पब्लिक स्कूल।
  10. 1989 में बाबा मस्तनाथ सभागार।
  11. 1990 में शिव मंदिर की स्थापना।
  12. 1991 में प्राचीन शिव मंदिर का जीर्णोद्धार।
  13. 1992 में थेहड़ी डेरा मंदिर।
  14. 1993 में चक 7 एल एल का निर्माण।
  15. 1994 में बद्री नाथ धर्मशाला निर्माण।
  16. 1995 में एम.बी.ए. कॉलेज की स्थापना।
  17. 1996 में फार्मेसी एवम् डी.एड. कॉलेज।
  18. 1997 में डेंटल कॉलेज की स्थापना।
  19. 1998 में फिजीयोथैरेपी एवम् मॉडर्न साइंस।
  20. 1999 में संस्कृत कॉलेज की स्थापना।
  21. 2000 में नर्सिंग कॉलेज की स्थापना।
  22. 2001 में कन्या छात्रावास की स्थापना।
  23. 2002 में सिद्ध बाबा रणपत मान्धाता समाधि स्थल का निर्माण।
  24. 2003 में रैबारी धर्मशाला का निर्माण।
  25. 2004 में शिक्षा रतन एवम् बहरोर विधायक।
  26. 2005 में चिकित्सा रतन एवम् छात्रावास न. 2।

गुरु की याद में—

पूज्य महन्त श्रेयोनाथ जी की स्मृति में महन्त चाँदनाथ जी द्वारा श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें अनेक साधु-संत महन्त एवम् भक्त जनों पूज्य महन्त जी को श्रद्धांजलि अर्पित की तथा उन्हें कम्बल भेंट कर परम्परानुसार दक्षिणा दी गई।

गुरु की स्मृति में 21 से 23 जनवरी, 1986 त्रयोदशी, चतुर्दशी पौष शुक्ल पूर्णिमा के दिन एक विशाल सम्मलेन का आयोजन किया गया। जिसमें अनेक संतों ने अपने विचार रखे।

गुरु के पदचिन्हों पर—

गुरु के द्वारा प्राप्त ज्ञान को कर्म रूप में प्रस्तुत करना गुरु की सच्ची आराधना है। वर्तमान में श्री बाबा मस्तनाथ मठ के महन्त चाँदनाथ जी ने अपने गुरु की आराधना में गुरु के कार्यों को विस्तृत रूप देकर पूर्ण किया। महन्त श्रेयोनाथ जी द्वारा प्रारंभ किये गए चिकित्सकीय एवम् जनोपयोगी कार्यों को विस्तृत एवम् आधुनिक रूप प्रदान किया। श्रीयुत् श्रेयोनाथ जी द्वारा स्थापित श्री बाबा मस्तनाथ धर्मार्थ नेत्र चिकित्सालय तथा श्री बाबा मस्तनाथ सामान्य चिकत्सालय का आधुनिकीकरण कर विशिष्ट रूप प्रदान किया। धर्मार्थ नेत्र चिकित्सालय में न सिर्फ रोगियों की सामान्य नेत्र चिकित्सा की जाती है, अपितु अत्याधुनिक विधियों द्वारा नेत्र प्रत्यारोपण, लेसर चिकित्सा तथा नेत्र संग्रहण जैसी सुविधायें भी उपलब्ध हैं। गुरु द्वारा स्थापित श्री बाबा मस्तनाथ धर्मार्थ सामान्य चिकित्सालय ने भी आज अपने विशाल स्वरूप को प्राप्त कर लिया है। यहाँ न सिर्फ एलोपेथिक चिकित्सा की विभिन्न आधुनिक शैलियों के द्वारा चिकित्सा की जाती है, अपितु आयुर्वेद चिकित्सा को भी विशिष्ट रूप प्रदान कर रोगियों को रोग मुक्त किया जाता है। इस चिकित्सालय को आधुनिक स्वरूप प्रदान करना महन्त चाँदनाथ जी की ही उपलब्धि है। श्रीयुत् श्रेयोनाथ जी द्वारा स्थापित आयुर्वेद महाविद्यालय का आधुनिकीकरण, नवीन आधुनिक पुस्तकालय का निर्माण, आधुनिक पौधशाला का निर्माण, चिकित्सीय जड़ी-बूटियों पर नवीन अनुसंधान एवम् आधुनिक रसायनशाला का निर्माण महन्त चाँदनाथ जी के ही प्रयासों का ही फल है। महन्त जी ने श्री बाबा मस्तनाथ मठ अस्थल बोहर क्षेत्र के चारों ओर चार दीवारी का निर्माण कराकर मठ को नवीन रूप प्रदान किया, ताकि मठ की गरिमा को मर्यादित किया जा सके। योगिराज चाँदनाथ जी ने न सिर्फ क्षतिग्रस्त प्राचीन भवनों का नवीनीकरण एवं पुनरुद्धार कराया, अपितु सौन्दर्यीकरण की ओर भी विशेष ध्यान दिया।

गुरु के समाधी स्थल का निर्माण—

अपने गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा, स्नेह के कारण एवं उनकी स्मृतियों को संजोये रखने के लिए महन्त चाँदनाथ जी योगी जी ने अपने पूज्य गुरु महन्त श्रेयोनाथ जी के समाधि स्थल का श्री बाबा मस्तनाथ जी के समाधि स्थल के समीप निर्माण करवाया जहाँ अखंड ज्योत हमेशा प्रज्ज्वलित रहती है। इसका निर्माण कार्य सन् 1986 में शुरू हुआ तथा सफेद मकराना पत्थर से सुशोभित इस समाधी की छटा देखते ही बनती है यह वास्तु कला का एक उत्कृष्ट एवं अनुपम नमूना है।

ज्ञान वृक्ष का विस्तार—

वृक्षों की जड़ें जितनी गहरी होती हैं वृक्ष उतना ही विस्तृत होता है। पूजनीय महन्त चाँदनाथ जी योगी ने अपने गुरु श्री श्रेयोनाथ जी द्वारा रोपे गए वृक्ष की जड़ों का सिंचन किया और नवीन ज्ञान वृक्षों का रोपण किया। यह ज्ञान वृक्ष न सिर्फ हरियाणा वासियों को अपितु सम्पूर्ण देश के ज्ञान उपासकों को ज्ञान फल का रसास्वादन करवा रहा है। महन्त चाँदनाथ जी ने नवीन ज्ञान वृक्षों का रोपण कर उन्हें संस्थान का रूप प्रदान किया जिसे आज श्री बाबा मस्तनाथ शिक्षण संस्थान के रूप से जाना जाता है। इस ज्ञान संस्थान में अनेक महाविद्यालय एवं चिकित्सालय हैं जो न सिर्फ ज्ञान के अपितु सेवा के केंद्र भी है।

वास्तुकला प्रेमी—

गुरु गुड ही रहे चेला शक्कर हो गया इस कहावत को चरितार्थ करते हुए महन्त चाँदनाथ जी योगी ने जीर्ण शीर्ण मंदिरों का पूर्णोद्धार एवं नवीनीकरण आधुनिक वास्तुकला के आधार पर करवाया। मठ के बीचों-बीच बना हठयोगी रनपतनाथ मान्धातानाथ जी के समाधि स्थल को नवीन रूप देकर 2 करोड़ की लागत से राजस्थान से लाए गए पत्थरों द्वारा इसे स्मृति स्थल बनाकर विशिष्ट रूप प्रदान किया गया। मस्तनाथ शिक्षण संस्थान में बना उत्तर भारत का विशाल एवं विशिष्ट सभागार जहाँ 1200 व्यक्तियों के बैठने की व्यवस्था है तथा जो पूर्णतया वातानुकूलित है महन्त जी की उच्च आकांक्षाओं का प्रतीक है यहाँ पर लगी स्क्रीन, प्रोजेक्टर आदि सभी आधुनिक संयंत्रों द्वारा संचालित हैं।

गौशाला का निर्माण—

मठ क्षेत्र में स्थित यह गौ शाला गायों के प्रति महन्त जी के स्नेह का द्योतक है यहाँ पर लगभग 500 गायें हैं। यहाँ सभी गायों की समय-समय पर चिकित्सा जाँच की जाती है तथा उनके चारे एवं जल की समुचित व्यवस्था की गई है।

नाथ साहित्य प्रेमी एवं संरक्षक—

योगी गुरु महन्त चाँदनाथ जी को साहित्य से अत्यंत लगाव रहा है तथा वे नाथ परम्परा के साहित्य संरक्षक की भूमिका का निर्वहन कर रहे है। नाथ रहस्य, नाथ सिद्धों की शंखाढाल, बाबा मस्तनाथ चरित, दिव्य भूमि मठ अस्थल बोहर तथा मेरे पूज्य गुरु देव आदि गुप्त एवं विल्लुप्त होते साहित्य ग्रंथों का काया कल्प कर उन्हें प्रकाश लेन का श्रेय महन्त चाँदनाथ जी को जाता है। हरियाणवी कैसट एवं सीडी के माध्यम से बाबा मस्तनाथ चरित्र का रूपांतरण करवाने का श्रेय श्री बाबा योगी महन्त चाँदनाथ जी को ही जाता है।

फोटो कैप्शन आज की फोटो के अतिरिक्त

नं. 1.      अपने गुरु महन्त श्रेयोनाथ जी को अन्तिम प्रणाम करते।

  1. महन्त चाँदनाथ जी को गद्दी नशीन करते नाथ सम्प्रदाय के साधुगण।
  2. विधि संकाय के उद्घाटन पर पधारे केन्द्रीय मंत्री सदानन्द गौड़ा का स्वागत करते तथा संकाय का

                उद्घाटन

                करते हुए महन्त चाँदनाथ।

4,5.         मुख्यमंत्री हरियाणा सरकार का स्वागत करते महन्त चाँदनाथ।

  1. बाबा मस्तनाथ स्कूल के बच्चों से भेंट करते महन्त चाँदनाथ।
  2. पूर्व पुलिस कमिश्रर मुम्बई तथा बागपत सांसद का सम्मान करते महन्त चाँदनाथ।
  3. विश्वविद्यालय में इन्डोर स्टेडियम का उद्घाटन करते महन्त चाँदनाथ।
  4. विश्वविद्यालय में एन.सी.सी. छात्रों को सम्मानित करते महन्त चाँदनाथ।

10ए और 10.       विश्वविद्यालय योगिराज फार्मेसी का उद्घाटन एवं निरीक्षण करते करते महन्त चाँदनाथ।

11 ए, बी, सी, डी. गौपाष्टमी के अवसर पर कलानौर के डेरा सत बाबा मेहरशाह में मुख्य अतिथि स्वरूप शिरकत करते

                महन्त चाँदनाथ।

  1. सोहम् मन्दिर में बाबा कपिलपुरी के साथ गुरु पूर्णिमा अवसर पर महन्त चाँदनाथ।
  2. विश्वविद्यालय के छात्रों को पुरस्कृत करते महन्त चाँदनाथ।

14ए एवं बी.    विवेकानन्द सार्धशती वर्ष में समारोह में विशेष भूमिका निभाते महन्त चाँदनाथ।

  1. युवावस्था में महन्त चाँदनाथ योगी।

16 ए एवं बी.   अलवर से सांसद बनने पर उमड़े जन समूह के साथ महन्त चाँदनाथ योगी।

  1. विश्वविद्यालय को यू.जी.सी. द्वारा मान्यता प्राप्त होने का पत्र दिखाते महन्त चाँदनाथ योगी।

18 ए एवं बी.   गीता भवन

  1. युवा समारोह में आर्मी एक्सपो के दौरान वीरों को श्रद्धांजलि देते महन्त चाँदनाथ योगी।

19 ए एवं बी.   युवा समारोह में रक्तदाताओं को सम्मानित करते महन्त चाँदनाथ योगी।

  1. शिक्षा पर बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय में हुए राष्ट्रीय सेमिनार के दौरान महन्त चाँदनाथ योगी।

21, 22, 23.           विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा रोहतक में आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करते महन्त चाँदनाथ योगी।

  1. केन्द्रीय खाद्य एवं उर्वरक मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर का स्वागत करते महन्त चाँदनाथ योगी।
  2. कन्या भू्रण हत्या पर विश्वविद्यालय में शपथ ग्रहण करवाते महन्त चाँदनाथ योगी।
  3. बेटी बचाओ आन्दोलन में विचार रखते महन्त चाँदनाथ योगी।
  4. विश्वविद्यालय में नई बिल्डिंग के निर्माण का भूमि पूजन करते महन्त चाँदनाथ योगी।
  5. विश्वविद्यालय में छोटे ओडिटोरियम का उद्घाटन करते हुए महन्त चाँदनाथ योगी।
  6. बाबा रामदेव जी के साथ महन्त चाँदनाथ योगी।

30, 31.   रणबीर हुड्डा जी के जन्मदिन पर उपस्थित विशेष सदस्यों को सम्मानित करते महन्त चाँदनाथ योगी।

  1. बाबा मस्तनाथ मूर्ति का विहंगम दृश्य।
  2. उत्तराखण्ड आपदा में राहत सामग्री भेजते महन्त चाँदनाथ योगी।
  3. राव नरवीर से मुलाकात करते महन्त चाँदनाथ योगी।

35, 36.   बाबा मस्तनाथ स्मृति मन्दिर के लिए यात्रा को हरी झण्डी दिखाते महन्त चाँदनाथ योगी।

37, 38.   विश्वविद्यालय में दिल्ली बीजेपी प्रमुख जगदीश मुखी का स्वागत करते महन्त चाँदनाथ योगी।

  1. बीकानेर के सांसद को सम्मानित करते महन्त चाँदनाथ योगी।
  2. विवेकानन्द सार्धशती वर्ष में प्रदेश अधिकारियों के साथ महन्त चाँदनाथ योगी।
  3. राव नरवीर का मठ में सम्मान करते महन्त चाँदनाथ योगी।
  4. बाबा रामदेव के साथ विचार-विमर्श करते महन्त चाँदनाथ योगी।

43,44.    बीजेपी संगठन के पदाधिकारियों से बातचीत करते महन्त चाँदनाथ योगी।

  1. बाबा मस्तनाथ मठ की मासिक पत्रिका का लोकार्पण करते महन्त चाँदनाथ योगी।

46,47.    अलवर से सांसद की टिकट मिलने पर सहयोगियों संग खुशी मनाते महन्त चाँदनाथ योगी।

  1. बाबा रामदेव को मठ भ्रमण कराते महन्त चाँदनाथ योगी।
  2. रक्तदाताओं को सम्मानित करते महन्त चाँदनाथ योगी।

50, 51.   नेत्र चिकित्सालय में रोगियों से हालचाल पूछते महन्त चाँदनाथ योगी।

  1. बच्चों को पुरस्कृत करते महन्त चाँदनाथ योगी।

53, 54, 55.           पुराणों का अध्ययन करते महन्त चाँदनाथ योगी।

  1. आशीर्वाद देते महन्त चाँदनाथ योगी।
  2. पत्रकारों के राज्यस्तरीय कार्यक्रम में भाग लेते महन्त चाँदनाथ योगी।
  3. बेटी बचाओ रैली को रवाना करते महन्त चाँदनाथ योगी।

59, 60.   बाबा बालकनाथ जी को अपना उत्तराधिकारी बनाते महन्त चाँदनाथ योगी।

  1. महन्त श्रेयोनाथ जी की याद में मस्तनाथ वाणी के स्पेशल अंक का लोकार्पण करते महन्त चाँदनाथ

                योगी।

  1. राजस्थान के सांसद को मठ में सम्मानित करते महन्त चाँदनाथ योगी।

 

 

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