अस्थल बोहर मठ का प्राचीन इतिहास भाग-1

((((((अस्थल बोहर मठ का प्राचीन इतिहास))))))

अस्थल बोहर का प्राचीन ‘मठ’ आठवीं शताब्दि से अब तक, राष्ट्र के लोक-मानस को, बिबिध विधि से”योग-मार्ग’ में प्रवृत्त होकर ‘ आत्म साक्षात्कार’ तथा ‘जन-कल्याण’ में प्रवृत्त होने की प्रेरणा देता आया है।यहाँ से दोक्षा-प्राप्त योगिजनो ने उक्त उद्देश्यों  की प्राप्ति के लिए मुख्यतया तीन साधना धाराओं  का अवलम्बन किया है । वे है – ‘हठयोग’ साधना, ‘कर्मयोग-साधना’ तया ‘राष्ट्र-प्रेम आराधना’ ।

अस्थल बोहर मठ का समूचा इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि यह मठ इसी ‘साधना-त्रिवेणी’ का संगम-स्थल रहा है । ‘हठ-योग-साधना’ इस मठ की प्रथम पावन-धारा  है । इस धारा का अनुसरण उन योगिजनों ने किया जिनका लक्ष्य ‘ब्रह्म साक्षात्कार ‘ रहा है । उन्होंने ‘हठ-चोग’ साधना प्रक्रियाओ के  माध्यम से स्वयं ‘ आत्म-साक्षात्कार किया, तम: साधना से विविध सिद्धियां प्राप्त की और दुखियों के दुःख  भजन’ कर  सर्व पूज्य  बने ।

सिध्द श्री चौरागेनाथ’ जी

सिद्ध श्री चौरगीनाथ” के विषय में अनेक क्या’ प्रचलित है उन सभी में यह समान रूप से स्वीकार किया गया है कि यह सियालकोट के  राजा ‘शालिवाहन ‘ की वडी रानी के सुपृत्र… थे । इनकी विमाता, छोटी रानी , इनकी ‘रूप-सम्पदा पर रीझ गई । छोटो रानी ने राजकुमार से अपनी वासना तृप्ति का अनुरोध किया पर उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया । इस पर छोटी रानी ने राजा के सामने उलटे राजकुमार पर ही यह आरोप’ लगा दिया क्रि उसने उन पर कुदृष्टि  डाली है और उसके शील भंग  की कुचेष्टा की हैं ।

राजा शालिवाहन ने छोटी रानी की  शिकायत से क्रुद्ध होकर  राजकूमार के हाथ पाव’ कटवाकर, उसे सियालकोट नगर से बाहर एक कुंए’ में डलवा दिया । राजकुमार, हाथ पाव’ काट दिये जाने पर. “चौरंगी” वने, कुंए’ मेँ पडे रहे । वहॉ एक मह्यसिध्द ‘योगी’ आए, उनकी कृपा से राजकूमार को पुन: हाथ मिले और इस प्रकार ‘पूर्णावयवी’ वन जाने से यह ‘पूरण भगत’ कहलाये ।

सियालकोट नगर से बाहर, पांच मील की दूरी पर, अब भी एक कुंआ’ बर्तमान है लोग उस कुएं की, इन्ही  पूरण भगत से सम्बध्द, ‘पूरण भगत वाला कुआं’ के  नाम से भी पुकारते है । उस कुंए’ के पास एक गाव’ भी आबाद है उस गाव’ का नाम भी “पूरण वाला’ ही है।

‘पूरण भगत वाले कुए” के विषय मैं ख्याति ‘है कि उस कुंए’ के जल में घाव भले की ‘ अद्भुत क्षमता’ है और उस कुंए” पर स्नान करने से निसन्तान महिलाओं को संतान प्राप्त हो जाती है । इसी आस्था के कारण अब भी सहस्त्रों महिलायें उस कुए  पर स्नान किया करती हैं ।

बाबा मस्तनाथ जी के चमत्कार

‘हाथ पाव’ कटे “चौरंगी ” को, योग बल से, हाथ  पाव’ प्रदान कर, “पूर्णावयवी ‘ बनाने वाले. मसासिद्ध योगी ‘स्वयं श्री गोरक्षनाथ ही थे’ यह मान्यता , श्रुतिपरम्परा  से, समूचे ’नाय सम्प्रदाय’ ( भेख) में चली आ रही है । मराठी भाषा से अनूदित ‘ योगिसम्प्र्दायाविश्कृति’ नामक पौराणिक ग्रन्थ तथा लोक-संगीत’ की अनेक पुस्तकों में यह भी प्रसंग  इसी रूप में आया है और हरियाणा, पजाब’ तथा राजस्थान आदि राज्यों में प्रचलित लोकगीतों एवं लोककथाओं में भी इस सन्दर्भ का इसी प्रकार वर्णन किया जाता है ।

“पूरण भगत’ ही, योगि-सम्प्रदाय में दीक्षित होकर, तप: साधना के प्रभाव से, अत्यन्त तेजस्वी ‘महासिध्द श्री चौरंगीनाथ ‘ हुए जिन्होने’ ” हठयोग ‘ की साधना कर, महाकाल के कालदण्ड को ख़डित” का दिया और सदा के लिए अजर अमर हो गए  ।

महासिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी की पुनीत तप: स्थली होने का सौभाग्य वर्तमान अस्थत्त जोहर मठ को प्राप्त है । सिध्द श्री चौरंगीनाथ जी ने आठर्वी सदी में यहीँ पर हठ-योग की साधना की थी और अपना लोक-बिश्रुत्त मठ स्थापित का यहीं पर ‘पाद पन्थ’ प्रवर्तित किया था । यही ‘पाद पन्थ’ आगे चलकर पाव-पन्थ, पागल-पन्थ अथवा गल-पन्थ के नाम से विख्यात हुआ ।

‘पाद पन्थ’  की साधना में साधक को भूमि पर सिर रखकर तथा आकाश की और पाव” करके , शीर्षासन की विधि से, तपस्या करनी पड़त्ती है । यह हठ-योग की साधना-प्रक्रियाओ में से ही एक है । इस साधना विधि को  ‘ सद्य: सिद्धि प्रदा’  कहकर  इसकी प्रशसा’ की गई है ।

महासिद्ध श्री चौरगीनाथ’ जी के समय में अस्थल बोहर का यह मठ अतीव समृद्ध था, यहॉ से सिद्धों की चौरासी पालकियों धर्म प्रचार के लिए एक साथ चला करती थी । यह किम्बदन्ती यहॉ की जनता में इस समय तक प्रचलित है।

सूक्ष्म रीति से देखने पर कई  एक तथ्य अब भी ऐसे उपलब्ध होते हैँ जिनसे प्रचलित जन-श्रुतिर्यो का साधार होना सिद्ध होता है प्रथम  यह कि इस मठ में अब तक हट-योग के साधक उफ्तब्ध होत्ते हैं ।

 दूसरे “योगिसम्प्रदायाविश्कृति ” में वर्णित वह विख्यात देवालय नामक तालाब यहॉ इस समय तक प्राप्त हो रहा है जिसकी पावन मिटटी को निकालकर महासिद्ध श्री चौरंगीनाथ जी के समय में रोगी जन मुक्त हो जाया करते थे । इस समय तक उक्त तालाब से मिटटी` निकालकर  व्याधि-मुक्त होने की मान्यता भेख तथा ज़न-साधारण  र्मेप्रचलित रही है और सहस्त्रों ब्याथिग्रस्त जन इस समय तक ऐसा करके  रोग मुक्त होते रहे हैं ।

रुद्राभिषेक से क्या क्या लाभ मिलता है

यद्यपि पूरण भगत को योगेश्वर श्री गोरखनाथ जी का शिष्य माना जाता है । परन्तु तिब्बत की  परम्परा में सिद्ध चौरंगीपा ‘ अर्थात सिद्ध चौरगीनाथ को सिद्ध मीनक्षा अर्थात सिद्ध मत्स्येन्द्रनाथ जी का शिष्य तथा सिद्ध गोरक्षपा (सिध्द गोरक्षनाथ जी) का ‘गुरू भाई’ ही बतलाया गया है । इस तथ्य क्रो पुष्ट करने वाले अनेक म्रन्थ तिब्बत के त्तंजूर’ नामक स्यान पर स्थित बौद्ध मठ से प्राप्त का महापडित्त’ राहुल सांस्कृतायन भारत में लाये है ।

Baba Mastnath ji

इन्हें भी देखे: